Published On: Thu, Sep 12th, 2019

एमपी के किसान की पीड़ाः उम्मीद की फसल का अतिवृष्टि से हुआ नास

भोपाल। मध्यप्रदेश के किसानों ने बड़ी आशा उम्मीद के साथ से खरीफ फसलों का उच्च गुणवत्ता वाला बीज महंगे दाम पर खरीद कर अपने खेतों में डाला था। जब किसान अपनी पूंजी को बीज के रूप में खुले आसमान के नीचे खेत मे बोता है तो रोज यही कामना करता है कि कुदरत मेहरबान रहे, इस वर्ष किसानों को बहुत उम्मीद थी खरीफ फसल से क्योंकि शुरुआत में बीज अच्छे अंकुरित हुए थे एवं किसानों के उम्मीद की फसलें भी लहलहाने लगी थी।
बढ़िया फसलों को देखकर किसानों का हौसला भी बढ़ा हुआ था एवं फसलों में आवश्यकता अनुसार लागत भी लगाई गयी थी।

परन्तु पिछले एक माह में जिस प्रकार से कुदरत का बरसात रूपी कहर बरपा है उससे किसानों की सभी आशाएं उम्मीदे एकबार फिर ध्वस्त हो गयी है। जमीनें जलमग्न है, फसलों में लगी फलियों में अतिवृष्टि की वजह से दाने भरने का दम नही बचा है, पौधों से फलियां और पत्ते भी झड़ने लगे है, फसले अब अंतिम सासें ले रही है।

कभी उचित दाम ना मिलना, कभी फ़र्टिलाइज़र पेस्टिसाइड रूपी जहरली कंपनियों के नकली उत्पादों से बीज खराब होना, कभी व्यापारियों द्वारा बिना भुगतान किए फरार हो जाना, कभी अच्छी फसल हो जाए तो सरकार द्वारा उसी फसल को निर्यात करके दाम गिरा दिया जाना और अब प्रकृति की मार। किसान संघर्ष का पर्याय बन चुका है।

किसान प्रतिवर्ष अपनी आंखों के सामने अपनी पूंजी को बर्बाद होते देखता है लेकिन इतना संघर्षशील एवं जुझारू है कि कभी हताश नही होता, अपने बीवी बच्चो को ढांढस बँधाते हुए हमेशा यही बोलता है कि जो अंजाम बाकी सब का होगा वही हमारा होगा।

किसानों के साथ हमेशा हुए विश्वासघात के बाद अब किसानों के नाम पर चुन कर आई सरकार से भी कोई खास आस उम्मीद नही है, वेसे भी कर्जमाफी के नाम पर सत्ता में आई सरकार अभी तक कर्जमाफी को लेकर अपनी नीति भी स्पष्ट नही कर पाई है। गेंहू की फसल का बोनस एवं भावन्तर का भी कोई अता-पता नही है। इतनी ठोकरे खाने के बाद किसानों को लगने लगा है कि सरकार से मुआवजे की उम्मीद करना भी बेमानी है। वैसे भी सरकार अभी यह तय भी नही कर पा रही है कि नुकसान हुआ है या नही? कितना हुआ है? कब सर्वे होगा? कब नुकसान का आंकलन होगा? कुछ राहत मिलेगी? कब बीमा मिलेगा? यह सायद किसी को नही पता है।

लेकिन किसानों को यह पता है की ट्रैक्टर की किस्त भरना पड़ेगा समय पर वरना बैंको के गुंडे घर आ जाएंगे। वैसे भी बैंको में सिर्फ बड़े अधिकारियों के साथ साठगांठ रखने वाले एवं सरकार तक पहुँच रखने वाले उद्योगपतियों के कर्ज ही तो इन.पी.ए. होते है किसानों के नही इसीलिए वक़्त पर क़िस्त भरने के लिए किसानों को पैसा की जरूरत होगी पर सरकारी घड़ी को इन सब भावनात्मक दलीलों से कुछ फर्क नही पड़ता वह अपनी गती से चल रही है उसमें कोई संवेदना, कोई भावना नही है।

अभी तक तो कृषि विभाग के दफ्तरों में पत्राचार होना शुरू भी नही हुए है।
कब गांव के खेतों से पटवारी फसलों की जानकारी तहसील भेजेगा?
तहसील से जानकारी कब जिले में कलेक्टर महोदय के पास जाएगी?
कब प्रदेश सरकार को नुकसान का पता चलेगा?
यह सब प्रक्रिया शुरू होगी तबतक तो आगामी फसल बोने का समय आ जाएगा।
अभी किसानों के हाथ खाली है। भविस्य में अगली फसल के लिए खेत तैयार करना है खाद, बीज खरीदना है, ट्रैक्टर-इंजन के लिए डीजल खरीदना है, बिजली का बिल भरना है, नहर का टैक्स भरना है,जैसे अनेको खर्चे है।

लेकिन यह सब सरकार को नही पता यदि पता होता तो किसानों को राहत देने के लिए प्रक्रिया शुरू हो गयी होती।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में यदि समय से प्रीमियम नही कटता तो किसान बीमा के लाभ से वंचित हो जाता हैं। तमाम गाइड लाइन है कि किसान की फसलों में नुकसान होने पर एक सप्ताह, एक माह में किसान को दावा राशि प्रदान की जावेगी पर यह सब कागजो में ही है धरातल से कोसों दूर ।
विपक्ष अब रोड पर आकर घंटा बजा रहा है लेकिन विपक्ष के बड़े नेताओं को यह तक नही पता कि किसान की फसलें अतिवृष्टि से खराब हुई या ओला पाला से, इन घंटा बजाते जनप्रतिनिधियों को यह भी नही पता है कि इनके छेत्र में किसानों की वास्तविक समस्या क्या है पर हाई कमान का आदेश है घंटा तो बजाना पड़ेगा।
घंटा बजाने से अच्छा है ऐसी विपदा की स्तिथि में गांव गांव जा कर किसानों की समस्याओं को समझा जाए एवं एक शसक्त विपक्ष के रूप में सरकार का जमीनी मुद्दों पर रचनात्मक विरोध किया जाए। लेकिन अभी कोई चुनाव नही है इसलिए गांवो में जाने का क्या फायदा।
कम से कम वर्तमान सरकार के किसानों के नाम पर बने बैठे जनप्रतिनिधि ही सरकार को अपने क्षेत्र की समस्या और नुकसानी के बारे में बताए ताकि सरकारी घड़ी की रफ्तार बढ़ सके।

एक बात तो तय है यदि किसान की फसल बर्बाद हुई और सरकार की घड़ी समय से नही चली तो इस घड़ी को उस दीवार से निकाल दिया जाएगा और एक नई समय और संवेदना के साथ चलने वाली घड़ी को दीवार पर प्रदेश का किसान लगाएगा।

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